डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ ही वैश्विक राजनीति का पारा चढ़ गया है। उनके एक हालिया बयान ने दुनिया भर के तेल बाजारों में खलबली मचा दी है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर ईरान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया, तो अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी कर सकता है। ये सिर्फ एक कूटनीतिक धमकी नहीं है। ये एक ऐसा दांव है जो सीधे आपकी जेब पर असर डालेगा। अगर आप सोच रहे हैं कि हजारों मील दूर एक समुद्री रास्ते के बंद होने से भारत के आम नागरिक को क्या फर्क पड़ता है, तो आप गलत हैं। तेल की कीमतों में आया ताजा उछाल तो बस शुरुआत है।
भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है। जब भी होर्मुज में तनाव बढ़ता है, ग्लोबल मार्केट में सप्लाई रुकने का डर हावी हो जाता है। सट्टेबाज सक्रिय हो जाते हैं और कीमतें आसमान छूने लगती हैं। ट्रंप का मिजाज हम सब जानते हैं। वो 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति पर चलते हैं और ईरान को घुटनों पर लाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। लेकिन इस पावर गेम में भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए जोखिम बहुत बड़ा है। Also making waves lately: Why The Strait of Hormuz Blockade Is A Massive Wake Up Call.
क्यों खास है होर्मुज जलडमरूमध्य और क्यों डरी है दुनिया
दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी पतले से समुद्री रास्ते से गुजरता है। ओमान और ईरान के बीच स्थित ये रास्ता ग्लोबल एनर्जी सप्लाई की लाइफलाइन है। सांख्यिकीय नजरिए से देखें तो हर दिन करीब 21 मिलियन बैरल कच्चा तेल यहाँ से निकलता है। अब कल्पना कीजिए कि अगर ट्रंप यहाँ अपनी नौसेना खड़ी कर दें या ईरान जवाबी कार्रवाई में इस रास्ते को ब्लॉक कर दे। सप्लाई चेन पूरी तरह टूट जाएगी।
इतिहास गवाह है कि जब भी खाड़ी देशों में अस्थिरता आई है, कच्चे तेल की कीमतों ने 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार करने में देर नहीं लगाई। अभी जो उछाल हम देख रहे हैं, वो केवल आशंकाओं पर आधारित है। असल एक्शन शुरू हुआ तो स्थिति भयावह हो सकती है। ट्रंप का तर्क है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय आक्रामकता को रोकने के लिए उसकी आर्थिक रग को दबाना जरूरी है। उनके लिए ये राजनीति है, लेकिन तेल आयात करने वाले देशों के लिए ये इकोनॉमिक नाइटमेयर है। More insights on this are explored by TIME.
भारत पर पड़ने वाला सीधा असर और बढ़ती चुनौतियां
भारत के लिए ये स्थिति दोहरी मार जैसी है। पहली मार तो सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ेगी। भारत में ईंधन की दरें अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी हैं। अगर कच्चा तेल महंगा होता है, तो तेल कंपनियां सारा बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देंगी। आप और मैं जब पेट्रोल पंप पर जाएंगे, तो हर लीटर पर 5 से 10 रुपये ज्यादा चुकाने पड़ सकते हैं। ये तो सिर्फ सीधी कीमत है।
असली खेल ट्रांसपोर्टेशन का है। भारत में लगभग हर सामान ट्रक और लॉरी से एक शहर से दूसरे शहर जाता है। डीजल महंगा होने का मतलब है कि सब्जी, फल, अनाज और रोजमर्रा की हर चीज महंगी हो जाएगी। खुदरा महंगाई (Retail Inflation) का ग्राफ तेजी से ऊपर जाएगा। आरबीआई (RBI) के लिए ब्याज दरों को काबू में रखना मुश्किल हो जाएगा। अगर महंगाई बढ़ी, तो आपकी ईएमआई (EMI) भी महंगी हो सकती है। ये एक ऐसा चक्र है जिससे बच निकलना आसान नहीं है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव
भारत का व्यापार घाटा हमेशा से एक बड़ी चिंता रहा है। हम जितना निर्यात करते हैं, उससे कहीं ज्यादा आयात करते हैं, और इस आयात बिल का सबसे बड़ा हिस्सा तेल का होता है। कच्चे तेल की कीमत में हर एक डॉलर की बढ़त भारत के आयात बिल को अरबों डॉलर बढ़ा देती है। इसका सीधा असर भारतीय रुपये की वैल्यू पर पड़ता है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होगा, जिससे विदेश में पढ़ाई, इलाज और घूमना-फिरना सब महंगा हो जाएगा। ट्रंप की एक छोटी सी घोषणा हमारे पूरे बजट को बिगाड़ने की ताकत रखती है।
क्या भारत के पास कोई बैकअप प्लान है
ईमानदारी से कहूँ तो रातों-रात कोई विकल्प तैयार नहीं होता। भारत ने पिछले कुछ सालों में रूस से सस्ते तेल का जुगाड़ करके अपनी अर्थव्यवस्था को सहारा दिया था। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब समीकरण बदल रहे हैं। अगर होर्मुज बंद होता है, तो रूसी तेल को भी भारत लाने में लॉजिस्टिक दिक्कतें आ सकती हैं। हमने अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves) तो बनाए हैं, लेकिन वो केवल कुछ दिनों की खपत के लिए पर्याप्त हैं।
हमें अपनी ऊर्जा निर्भरता को बांटना होगा। अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से तेल के नए स्रोत तलाशना अब मजबूरी बन गई है। साथ ही, इथेनॉल ब्लेंडिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) पर हमारी निर्भरता को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा। ट्रंप की नीतियां अनिश्चित होती हैं। वो आज कुछ कहेंगे, कल कुछ और। भारत को इस अनिश्चितता के लिए तैयार रहना होगा।
भू-राजनीतिक दांवपेंच और ट्रंप की रणनीति
ट्रंप को लगता है कि दबाव बनाकर ही समझौता किया जा सकता है। वो ईरान पर 'मैक्सिमम प्रेशर' की नीति दोबारा लागू कर रहे हैं। पिछली बार जब वो सत्ता में थे, तब भी उन्होंने कड़े प्रतिबंध लगाए थे। लेकिन इस बार दुनिया बदल चुकी है। चीन और रूस अब ईरान के साथ ज्यादा मजबूती से खड़े हैं। अगर अमेरिका नाकेबंदी की कोशिश करता है, तो टकराव की स्थिति केवल खाड़ी तक सीमित नहीं रहेगी।
भारत के लिए चीन का फैक्टर भी अहम है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। अगर उसे तेल मिलना बंद हुआ, तो वो चुप नहीं बैठेगा। ऐसे में भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों को इस तरह मैनेज करना होगा कि हमारी ऊर्जा सुरक्षा दांव पर न लगे। हम अमेरिका के मित्र हैं, लेकिन हमारी जरूरतें अलग हैं। ट्रंप की इस आक्रामकता के बीच भारत को अपनी स्वायत्तता बनाए रखनी होगी।
आम आदमी के लिए अब क्या विकल्प बचते हैं
जब हाथी लड़ते हैं, तो घास ही कुचली जाती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इस दंगल में आम आदमी को खुद को सुरक्षित करना होगा। ये समय फिजूलखर्ची कम करने और बजट को री-प्लान करने का है। अगर तेल की कीमतों में ये उछाल बरकरार रहता है, तो आने वाले कुछ महीने चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा, खासकर उन कंपनियों के शेयरों में जो कच्चे तेल को कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल करती हैं, जैसे पेंट और प्लास्टिक कंपनियां।
अगले कुछ हफ्तों में होर्मुज से आने वाली खबरों पर नजर रखना जरूरी है। अगर वहां नौसैनिक हलचल बढ़ती है, तो मान लीजिए कि महंगाई का नया दौर आने वाला है। हमें ये समझना होगा कि वैश्विक संकट अब सरहद तक सीमित नहीं रहते। वो आपके किचन और बैंक अकाउंट तक पहुँच जाते हैं। ट्रंप के इस ऐलान ने जो चिंगारी सुलगाई है, वो अगर आग बनी तो उसकी तपन से कोई नहीं बच पाएगा।
अपनी वित्तीय सुरक्षा के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दें। लंबी दूरी की यात्राओं की प्लानिंग सोच-समझकर करें और अपनी बचत को ऐसी जगह लगाएं जो महंगाई की मार झेल सके। सरकारी स्तर पर हम शायद बहुत कुछ न बदल पाएं, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर सतर्कता ही एकमात्र बचाव है। आने वाले समय में ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों को अपनाना अब केवल पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि अपनी जेब बचाने के लिए भी जरूरी हो गया है।